रिश्ते खाते-मीठे, नये-पुराने, अनूठे और अलबेले है। इन्ही की गर्माहट से तो जीवन सफल बनता है। सामाजिक प्राणी होने के नाते हम सबके साथ रहना पसंद करते है। पति-पत्नी, माता-पिता, दोस्त, भाई-बहन, ननद-भाभी, सास-बहू, जीजा-साली। जीवन में हम कितने ही रिश्ते निभाते है।

दुनिया में हर रिश्ता प्यार और विश्वास की नीव पर टीका होता है। समर्पण, त्याग और देखभाल से ये मजबूत बनते है, पर कई बार अति करने से ये बेलगाम भी हो जाते है या फिर बेड़ी बन जाते है, जिससे हमारा दम घुटने लगता है।

एक-दूसरे की परवाह, प्यार और अपनापन अच्छा है, पर जब कोई भी भावना ज्यादा हो जाए, तो समझिए कुछ बुरा हो सकता है।

हर शादी चाहे love marriage हो या arranged, एक समझोता होता है। रिश्तों में पारदर्शिता होना जरूरी है, लेकिन अति नही। आइए देखे की किन भावनाओ के अति से हमें बचना चाहिए –

रिश्तों में बचे! इन चीजों का जरूरत से ज्यादा होना ठीक नहीं

1. अधिकार की भावना

किसी भी करीबी रिश्ते में अधिकार की भावना होना स्वाभाविक है, लेकिन ज्यादा अधिकार की भावना होने से आप सामने वाले को space नहीं दे पाते।

आपको लगता है कि आप उससे बहुत ज्यादा प्यार कर रहे है, उसकी देखभाल कर रहे है, लेकिन इसके चलते आप उसकी personal space को खत्म कर देते है, जिससे उसे घुटन होने लगती है।

तलाक के कई कारणों में अधिकार की भावना बहुत बड़ा मुद्दा है। पति-पत्नी में से कोई एक अगर इससे ग्रस्त है, तो जलन, घुटन आती है और जिंदगी नासूर बन जाती है।

जिससे भी आप प्यार करते है, उसकी जगह खुद को रखकर सोचे की कही आप में भी अधिकार की भावना तो नही? अगर हाँ, तो खुद को तुरंत बदलने की कोशिश करे।

2. Space न देना

पति-पत्नी या सहेलियो में नजदीकी स्वाभाविक है। एक-दूसरे को गुप्त बातें जानना भी स्वाभाविक है, पर समस्या तब होती है, जब दोनो एक-दूसरे को अपने मन मुताबिक चलना चाहते है और हर बात की रिपोर्ट माँगते है, खाली समय बिल्कुल नही देते।

ऐसे में हर बात की सफाई देते-देते थकान या निराशा आने लगती है।

‘ सर्प्राइज ‘ रिश्तों में हमेशा नयापन लता है, जिसके लिए थोड़ी दूरी और space जरूरी है। कुछ दूरी रिश्तों में मिठास भी भर देती है।

बेहतर होगा कि जब भी संभव हो, कुछ समय दोस्तों, जीवन साथी, सहेली से अलग भी बिताने की कोशिश करे। आपके रिश्तों में नयी रोशनी आएगी।

3. तारीफ करना

तारीफ करना और सुनना हम सभी को बहुत अच्छा लगता है, पर बहुत अधिक तारीफ करने से सामनेवाला उसे सहज तौर पर लेने लगता है।

संगी-साथियों में भी अधिक तारीफ से वे आपको हलके में लेने लगते है या बात की कद्र नही समझ पाते। जिसकी वजह से आपका मन बुझ जाता है। तारीफ कीजिए, पर सोच-समझकर और बार-बार मत दोहराइए।

4. रक्षात्मक (Protective) होना

रिश्तों में हम अपनों के प्रति रक्षात्मक हो जाते है। माता-पिता, पत्नी, बच्चे, बहन या प्रेमी किसी की भी चिंता करना अच्छा है, पर इतनी चिंता करना कि वो असहज हो जाए? आप पर पूरी तरह निर्भर हो जाए, ठीक नही। 

बेटियो या अपनी पत्नी की सुरक्षा की दृष्टि से घर से बाहर न निकलने देना, मनचाहे कपड़े न पहनने देना, मनचाही नौकरी न करने देना या दूसरे शहर न जाने देना उनके व्यक्तित्व को कमजोर बनाएगा और निराशा विकसित करेगा।

बेहतर होगा कि आप उनके व्यक्तित्व को बढ़ने दे।

5. ज्यादा उम्मीदें

सास को बहू से, पति को पत्नी से, बच्चे को माता-पिता से, दोस्तों को आपस में एक दूसरे से उम्मीद होती है। हर रिश्ता उम्मीदों पर टीका होता है।

बहुत ज्यादा उम्मीदों से रिश्ता खत्म हो जाते है। हम दूसरों से जरूरत से ज्यादा उम्मीद करते रहते है, बिना उसकी स्तिथि को समझे।

साथ ही हम भूल जाते है कि हमने उनके लिए क्या किया? कई बार impracticable उम्मीद कर बैठते है, नतीजा मनमुटाव, इसलिए दूसरों से बहुत अधिक उम्मीद न रखे, आप खुश रहेंगे और आपके रिश्ते कामयाब।