मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह सुख चाहता है। इसीलिए हर ऐसे काम करता है जिससे दुख दूर रहें। चाहे वह पूजा पाठ करे या सांसारिक कार्य करे, उद्देश्य केवल एक होता है कि दुख उसके पास कभी ना आए और वो हमेशा सुख रहे।

अब सवाल यह है कि ऐसी तरकीब क्या है जिससे मनुष्य दुखों में भी दुखी न हो। यह बात समझने के लिए, यह बात अपने जीवन में उतारने के लिए कि दुखों में भी दुखी कैसे नहीं होते ? पहले यह समझना ज़रुरी है कि दुख क्या है इसका कारण क्या है और उसको दूर करने का उपाय क्या है ?

दुख के बारे में अगर आप विचार करें तो देखेंगे कि दुख दो प्रकार के होते हैं, एक शारीरिक, दूसरा मानसिक। इन दोनों प्रकार के दुखों में भी हम देखते हैं कुछ ऐसे दुख होते हैं जिनको हम जानते ही नहीं, कुछ ऐसे दुख होते हैं जिसको हम जानते हैं पर दूर नहीं कर पाते क्योंकि हमारी आदत पड़ गई है। तीसरे प्रकार के दुख वह हैं जिनको हम जानते भी है और आसानी से दूर भी कर सकते हैं।

सुख और दुख क्यों होते हैं? Dukh Kyu Aate Hai?

दुख क्यों आते है? क्या है इसकी वजह
Dukh Kyu Aate Hai?

पहले प्रकार के जो दुख है जिनको हम जानते भी नहीं हैं। यह बात सुनकर कुछ विचित्र लगती है कि ऐसा कैसे हो सकता है कि हम दुखी भी हों और यह जानें भी नहीं कि हमारे ऊपर दुख है।

इस बात में रविन्द्रनाथ टैगोर ने एक बार लिखा था कि एक बालक था उसको जन्म से ही कम दिखाई देता था। लेकिन वह यही समझता था कि सबको ऐसा ही दिखाई देता होगा और उसका जीवन चलता रहा। बाद में एक बार उसको आँखों का डॉक्टर मिल गया। उसने उसको चश्मा लगा दिया तब उसको पता चला कि मैं पहले कितना दुखी था।

दूसरे प्रकार के दुख वह है जिनको हम जानते हैं पर आदत पड़ने के कारण दूर नहीं कर पाते। जैसे नशा करना। इसके उदाहरण हो लेकर एक कहानी मुझे याद है – एक व्यापारी था जो कपड़े की गांठ अपनी पीठ पर लादकर जगह-जगह उसको बेचने के लिये फेरी लगाता था।

लगभग तिस साल बाद जब वह बुढा हो गया तो उसके बेटों ने कहा कि अब आप फेरी लगाना बंद कर दीजिए। लेकिन जब भी कभी जाना होता तो वह अपने कंधे पर कुछ न कुछ अवश्य रख लेता और कहता कि बिना इसके मुझसे चला नहीं जाता। यह दूसरे प्रकार के दुख है जिनको हम जानते हैं कि दुख है फिर भी आदत पड़ने के कारण दूर नहीं कर पाते।

तीसरे प्रकार के दुख वह है जिन्हें हम जानते भी हैं और आसानी से दूर भी कर सकते हैं। एक बात और है कि अगर हम दुखों का कारण विचार करें तो असली कारण हम खुद है। चाहे वह सांसारिक कष्ट हो चाहे मानसिक कष्ट हो, हमारे कारण ही वह हमारे ऊपर आए हैं।

सांसारिक और शारीरिक जो कष्ट होते हैं वह इसलिए होते हैं कि हमारी रहनी-सहनी, हमारा खान-पान कहीं न कहीं गलत है। मानसिक कष्ट का अगर हम कारण ढूंढे तो वह हमारा व्यवहार या चरित्र ही होता है। इन दोनों को दूर करने के लिए जो उपाय हैं उसके बारे में हम सोचें।

शारीरिक कष्टों के दूर करने के लिए जो उपाय है वो हजरत मूसा के जीवन की एक घटना से पता लगता है। हजरत मूसा एक बार बीमार पड़े तो उन्होंने खुद से दुआ की कि मुझे ठीक कर दो और ठीक हो गये। फिर दोबारा जब बीमार हुए फिर ईश्वर से प्रार्थना की और इस बार भी उसने कृपा करके उनको ठीक कर दिया परन्तु तीसरी बार ऐसा हुआ तो उनको ऐसा लगा कि आकाश वाणी से आवाज़ आई है कि है मूसा तू मुझे क्यों बार-बार तंग करता है।

अगर मैंने बीमारी बनाई हैं तो हकीम और जड़ी-बूटियां भी बनाई हैं उनका इस्तेमाल कर। यह तो शारीरिक कष्टों को दूर करने का उपाय था। लेकिन असली कष्ट जो हमको होता है वह मानसिक कष्ट होता है। एक ही वस्तु अलग-अलग मनुष्यों को अलग-अलग कष्ट पहुँचाती है।

इसके अलावा जिस वस्तु से हमको कष्ट मिल रहा है वह यह ज़रुरी नहीं है कि हर स्थिति में वह कष्टदायक हो, या सुख देने वाली हो।

जैसे कभी-कभी हम देखते हैं कि हमारा बच्चा जब हम शाम को काम से लौटकर आते हैं तो वह सुख देता है, गोद में चढ़ जाता है उसको प्यार करते हैं, सुख प्राप्त करते हैं। परन्तु जिस दिन office या काम में हमको नुकसान हो गया हो दुख हो रहा हो तो उस दिन अपनी पत्नी को कहेंगे अरे बच्चे को हटा लो आज मेरा mood ठीक नहीं है आज इसको दूर ही रखो। तो जो सुख देने वाली चीज भी थी वह मन की स्थिति के अनुसार दुख भी देती है।

मानसिक दुखों को दूर करने के दो उपाय हैं। एक तो उपाय विचार छोड़ने का है। आओ देखेंगे कि जाग्रत (जब बह जागे हुए होते है) के जो सुख-दुख हैं, वह जब हम सोने लगते हैं तो वह हमसे छूट जाते हैं और हम दूसरे सुखों-दुखों की दुनिया में चले जाते हैं जिनको हम स्वप्न कहते हैं, वहां पर हमारे सुख-दुख दूसरे प्रकार के होते हैं और जब सुषुप्ति (deep sleep) में जाते हैं तो वह विचार भी छूट जाते हैं और वहां हम बिना इनके रहते हैं।

इसलिए जब सुषुप्ति (sleeping) के बाद जागते हैं तो कहते हैं कि आज बड़े आनंद की नींद आई है। क्योंकि उस सुषुप्ति अवस्था (sleeping situation) में हमारे सारे विचार हमसे दूर हो जाते हैं। उसके अलावा जो दुख देने वाले विचार हैं, जैसे किसी को इसका दुख हो कि मेरी बेटी का विवाह नहीं होता तो जिस दिन विवाह हो जायेगा उस दिन हम सुखी होंगे, इसलिए नहीं कि विवाह हो गया इसलिए कि उस विचार से हमको छुट्टी मिल गई। यही दूसरे प्रकार के दुख में भी होता है।

जब-जब हम उस दुख के विचार से अपने को छुड़ा लेते है हमको सुख का अनुभव  होता है और दिक्कत क्या होती है कि जब एक विचार से हम छुटते हैं तो मन खाली नहीं रहना चाहता वह दूसरा विचार पकड़ लेता है। इसलिए हम एक के बाद एक दुख पकड़ते रहते हैं और अगर हम अपने को विचार रहित बना सके तो आनंद प्राप्त होता है।

इसी अवस्था के लिए महर्षि पतंजलि ने लिखा था – ईश्वर से मिलने का एक ही उपाय है कि सब विचारों से अपने को हटा दें और तब वह आनंद का श्रोत हमारे लिए खुल जाता है और हम आनंद प्राप्त करते हैं।

यह तो एक उपाय था। दूसरा उपाय जो जीवन में व्यावहारिक तौर पर उतारना पड़ेगा। वह है समर्पण। “संसार में मेहमान बनकर रहो। जो कुछ मैं और मेरा है उसको तू और तेरा में बदल दो।”

जब हम यह विचार अपने जीवन में उतार लेंगे तो चाहे पुत्र की मृत्यु भी हो जाए तो हमारा भाव यह रहेगा जिसका था उसने ले लिया। वह दुख नही आयेगा जो आता है। यानि उस समय हम उस स्थिति में होंगे कि दुख के रहते हुए भी दुखी न होंगे।

यही बात भगवान कृष्ण ने अर्जुन को कही थी कि तुम सम अवस्था में रहो। जब अर्जुन ने यह कहा कि यह मन तो बड़ा चंचल है। मुझे सम अवस्था में नहीं रहने देता तो उन्होंने यही कहा था कि अभ्यास और वैराग्य से यह चीज प्राप्त होती है। वैराग्य यही है कि संसार में जो कुछ मैं और मेरा का बंधन है उसको तू और तेरा में बदल दो।

हजरत हसन के जीवन की एक घटना है। एक बार उनको आकाशवाणी सुनाई दी और लगा कि ईश्वर उनसे कह रहा है कि “ऐ हसन क्या तू चाहता है कि मैं तेरा हो जाऊँ”।

उन्होंने कहा – नहीं। 

फिर दूसरी बार सुनाई दी कि “क्या तू चाहता है कि तू मेरा हो जाऊँ ?” 

फिर उन्होंने यही कहा कि नहीं

ख़ुदा ने फिर कहा कि सब लोग यह चाहते हैं कि मैं उनका हो जाऊँ, तू क्यों नहीं चाहता? तो उन्होंने कहा कि मैं तेरी मर्ज़ी पसंद हूं। यही असली दुख दूर करने की तरकीब है कि दुख में भी हम दुखी न हों इसके लिए अपने को उसकी मर्ज़ी के अनुसार ढाले। अर्जी हमारी हो लेकिन मर्जी उनकी हो।