जगन्नाथ पूरी मंदिर रोचक तथ्य.. रथ यात्रा

ओडिशा के पूरी में मौजूद जगन्नाथ जी का मंदिर पूरी दुनिया मे लोकप्रिय है. ये मंदिर हिन्दुओं के चारो धाम के तीर्थ स्थान में से एक है. कहते है की मरने से पहले हर हिन्दी को चारो धमो की यात्रा करनी चाहिए. इससे मोक्ष की प्राप्ति होती है.

जगन्नाथ पूरी मंदिर रोचक तथ्य.. रथ यात्रा

जगन्नाथ पूरी में भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण का मंदिर है, जो बहुत विशाल और कई सालो पुराना है. इस मंदिर में लखो भक्त हर साल दर्शन के लिए जाते है. इस जगह का एक मुख्या आकर्षण जगन्नाथ पूरी की रथ यात्रा है. ये रथ यात्रा किसी उत्सव से कम नही होता, इसे पूरी के अलावा देश और विदेश के कई हिस्सो में भी मनाया जाता है.

कब होती है रथ यात्रा ?

जगन्नाथ जी की रथ हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष के दूसरे दिन निकाली जाती है. इस साल 4 जुलाई 2019, गुरुवार के दिन निकाली जाएगी. रथ यात्रा का त्यौहार 10 दिन का होता है. इस दौरान पूरी में लखो की संख्या में लोग पहुचते है और इस त्यौहार का हिस्सा बनते है. इस दिन भगवान श्री कृष्ण, उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा को रथों में बैठाकर गुंडीचा मंदिर ले जाया जाता है. तीनो रथों को भव्य रूप से सजाया जाता है, जिसकी तैयारी महीनो पहले से शुरू हो जाती है.

रथ यात्रा की कहानी

इस रथ यात्रा से जुड़ी बहुत सी कहानी है, जिसके कारण इस त्योहार का आयोजन होता है. कुछ कहानी में आपसे शेयर करना चाहूँगा.

कुछ लोगो का मानना है कि भगवान कृष्ण की बहन सुभद्रा अपने मयके आती है और अपने भाइयों से नगर भ्रमण करने की इच्छा व्यक्त करती है, तब कृष्णा, बलराम और सुभद्रा के साथ रथ मे सवार होकर नगर घूमने जाते है. इसी के बाद से रथ यात्रा का पर्व शुरू हुआ.

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इसके अलावा कहते है, गुंडीचा मंदिर मे स्थित देवी, कृष्णा की मासी है, जो तीनो को अपने घर आने का निमंत्रण देती है. श्री कृष्णा, बलराम, सुभद्रा के साथ अपनी मासी के घर 10 दिन के लिए रहने जाते है.

श्री कृष्ण के मामा कंश उन्हे मथुरा बुलाते है, इसके लिए कांश गोकुल में सारथि के साथ रथ भिजवाता है. कृष्ण अपने भाई बहन के साथ रथ में सवार होकर मथुरा जाते है. जिसके बाद से रथ यात्रा पर्व की शुरुवात हुई.

कुछ लोगो का मानना है कि इस दिन श्री कृष्ण कंश का वध करके बलराम के साथ प्रजा को दर्शन देने के लिए बलराम के साथ मथुरा मे रात यात्रा करते है.

कृष्ण की रानियाँ माता रोहिणी से उनकी रासलीला सुनने को कहती है. माता रोहिणी को लगता है कि कृष्ण की गोपियो के साथ रासलीला के बारे मे सुभद्रा को नही सुनना चाहिए, इसलिए वो उसे कृष्ण, बलराम के साथ रथ यात्रा के लिए भेज देती है. तभी वहा नारद जी प्रकट होते है, तीनो को एक साथ देख वो प्रसन्न हो जाते है और प्राथना करते है कि इन तीनो के ऐसे ही दर्शन हर साल होते रहे. उनकी ये प्राथना सुन ली जाती है और रथ यात्रा के द्वारा इन तीनो के दर्शन सबको होते रहते है.

जगन्नाथ मंदिर की कहानी

कहते है, श्री कृष्ण की मृत्यु के बाद जब उनके शरीर को द्वारिका लाया जाता है, तब बलराम अपने भाई की मृत्यु से बहुत ज़्यादा दुखी होते है. कृष्ण के शरीर को लेकर समुद्र मे कूद जाते है, उनके पीछे-पीछे शुभद्रा भी कूद जाती है.

इसी समय भारत के पूर्व (east) मे स्थित पूरी के राजा इन्द्रद्युम को सपना आता है कि भगवान का शरीर समुद्र मे तैर रहा है, इसलिए उन्हे यहा कृष्ण की एक विशाल प्रतिमा बनवानी चाहिए और मंदिर का निर्माण करवाना चाहिए. उन्हे सपने मे देवदूत बोलते है कि कृष्ण के साथ, बलराम, शुभद्रा की लकड़ी की प्रतिमा बनाई जाए और श्री कृष्ण की अस्थियो को उनकी प्रतिमा के पीछे छेद करके रखा जाए.

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राजा का सपना सच हुआ, उन्हे कृष्ण की अस्थिया मिल गई, लेकिन अब वो सोच रहा था की इस प्रतिमा का निर्माण कौन करेगा. माना जाता है कि शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा एक बढ़ई के रूप मे प्रकट होते है और मूर्ति का कार्य शुरू करते है. कार्य शुरू करने से पहले वो सभी से बोलते है कि उन्हे काम करते समय परेशान नही किया जाए, नही तो वो बीच में ही काम छोड़ कर चला जाएगा.

कुछ महीने हो जाने के बाद मूर्ति नही बन पाती है, तब उतावली के चलते राजा बढ़ई के कमरे के दरवाजा खोल देता है, ऐसा होते ही भगवान विश्वकर्मा गायब हो जाते है. मूर्ति उस समय पूरी नही बन पाती है, लेकिन राजा ऐसे ही मूर्ति को स्थापित कर देते है, वो सबसे पहले मूर्ति के पीछे भगवान की अस्थिया रखते है और फिर मंदिर मे विराजमान कर देते है.

हर साल एक विशाल रथ मे भगवान श्री कृष्ण, बलराम और सुभद्रा रथ यात्रा के रूप में जुनूस निकाला जाता है. भगवान कृष्ण, बलराम और शुभद्रा की प्रतिमा 12 साल के बाद बदली जाती है, जो नयी प्रतिमा रहती है वो भी पूरी बनी हुई नही रहती. जगन्नाथ पूरी का ये मंदिर एकलौता ऐसा मंदिर है जहा 3 भाई बहन की प्रतिमा एक साथ और उनकी पूजा अर्चना की जाती है.

रथ के बारे में जानकारी

  1. जगन्नाथ / श्री कृष्ण
    रथ का नाम : नंदघोश
    रात मे मौजूद पहिए : 16
    रात की उचई : 13.5 मीटर
    लकड़ी की संख्या : 832
  2. बलराम
    रथ का नाम : ताल ध्वज
    रथ मे मौजूद पहिए : 14
    रथ की उँचाई : 13.2 मीटर
    लकड़ी की संख्या : 763
  3. शुभद्रा
    रथ का नाम : देवदलन
    रथ मे मौजूद पहिए : 12
    रथ की उँचाई : 12.9 मीटर
    लकड़ी की संख्या : 593

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