प्रेम – The Love

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प्रेम - The Love
प्रेम – The Love

प्रेम (love) भगवान (god) की दी हुई अनमोल (priceless) देन है. भगवान ने यह देन मनुष्य, पशु, पक्षी, पेड़, पौधे सब को को बिना भेद-भाव के समान (equally) रूप से प्रदान की है. प्रेम के दरबार में राजा-रंक, आमिर-गरीब, सुन्दर-असुंदर, पढ़ा-बेपढ़ा, किसी में कोई अंतर (difference) नहीं बरता जाता. और हाँ, ज्ञान की पढाई में तो यह सीमा (limit), यह बंधन है कि इसे पढ़ने का अधिकार सिर्फ मनुष्य को है लेकिन ऐसी सीमा, ऐसा बंधन प्रेम की पढाई में नहीं है.

यह एक ऐसी अलौकिक … ऐसी दिव्य पढाई है कि इसे मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, पेड़, पौधे सब समान (equally) रूप से पढ़ लेते है. और सबके लिए इसकी एक ही भाषा है, और वह है ‘ मौन ‘ (silent) , जो एक-दुसरे की समझ में समान रूप से भली प्रकार आ जाती है. और आश्चर्य (wonder) देखिए कि इसके पढ़ने के लिए किसी गुरु की आवश्यकता नहीं पड़ती. यह तो पहले से ही दिल में मौजूद है, बस उपयुक्त (suitable) समय पर प्रकट हो जाता है.

प्रेम – The Love

प्रेम के दो रूप होते है . एक जो ‘ किया जाता है ‘ , इसमें प्रेमी कर्ता (performer) होता है. और दूसरा प्रेम जो  ‘ हो जाता है ‘, इसमें प्रेमी अकर्ता (recipient) है . जो प्रेम ‘ किया जाता है ‘ उसका कोई कारण (reason) होता है ….. वह किसी चीज पर आधारित (based) होता है मतलब कोई किसी के रूप ( सौन्दर्य ) पर मोहित होकर प्रेम करने लगता है और कोई किसी के गुण पर रीझ कर उससे प्रेम करने लगता है. जो प्रेम किया जाता है. वह धीरे-धीरे बढ़ कर पूर्णता (perfection) प्राप्त करता है, अर्थात ‘ प्रेम हो जाता है ‘. और चूंकि प्रेम के पूर्णता (perfection) प्राप्त करने से पहले इसमें बुद्धि काम करती है, इसलिए इसमें कुछ खतरे भी रहते है. लेकिन प्रेम की पूर्ण अवस्था (perfect condition) पर पहुँच जाने पर बुद्धि की दखलंदाजी समाप्त हो जाती है और फिर कोई खतरा नहीं रहता है.

और जो प्रेम ‘ हो जाता है ‘ उस पर किसी का बस ( जोर ) नहीं चलता, वह तो बस हो जाता है. यह ऐसा मार्ग (path) है जिसमे मंजिल-ब-मंजिल चलना नहीं पड़ता … इसमें तो प्रेम एक कदम चला और मार्ग पूरा का पूरा तय और यात्रा समाप्त. तह प्रेम कोई साधन नहीं है जिसमे धीरे-धीरे उन्नति होती है, यह तो स्वयं-सिद्ध (self-proven) है जो प्रथम दिन ही पूर्ण होता है 100 % . और जब हो जाता है तो हमेशा के लिए हो जाता है और जीवन भर फिर समाप्त नहीं होता है.

जो प्रेम ‘ हो जाता है ‘ वह बिना किसी करण के होता है. अर्थात यह प्रेम रूप ( सौन्दर्य ) के आकर्षण (attraction) के कारण नहीं होता है. बल्कि इस प्रकार के प्रेम की खूबी ( विशेषता ) तो यह है कि यह स्वयं प्रेमपात्र को रूप ( सौन्दर्य ) प्रदान कर देता है, अर्थात प्रेमी की दृष्टि में असुन्दर (inelegant) प्रेमपात्र भी संसार में सबसे सुन्दर दिखाई देता है. कहते है लैला बहुत कली थी, परन्तु फिर भी उससे मजनू का प्रेम जगत भर में प्रशिद्ध है ….. स्वयं में एक उदाहरण है. इस सम्बन्ध में महान सूफी-संत मौलाना रूम लिखते है –

गुफ्त लौलारा खलीफा क आँ तुई l
कज़ तो मजनू शुद परीशानो -गवी  ll
अज़ दिगर खूबां तो अफजूं नेस्ती l
गुफ्त ख़ामुश चूं तो मजनूं नेस्ती ll

लैला से खलीफा ने कहा कि क्या तू ही वह है जिसकी वजह से मजनूं दीवानों की तरह परेशान फिरता है ? तू और ओर सुंदरियों से तो बढ़कर नहीं है ? लैला ने उत्तर दिया – ‘ चुप रह , तू मजनूं नहीं है . ‘ अर्थात लैला को मजनूं की आँखों से देखना चाहिए .

जो प्रेम ‘ हो जाता है ‘ , वह प्रेमपात्र के किसी गुण के करण भी नहीं होता. यह तो बस हो जाता है. क्यों हो जाता है ? इस बात को … इस रहस्य को कोई नहीं जनता. पूछो तो कोई बता भी नहीं पाता… अरे कोई कारण हो तो वो बताए भी. और यदि अधिक पूछो तो बस धीरे से शर्मा कर मुस्करा देते है.

प्रेम का कोई भी रो अर्थात चाहे ‘ प्रेम किया जाए ‘ या ‘ प्रेम हो जाए ‘, प्रेमी मुहं से कुछ कहता नहीं, प्रेम में किसी प्रकार का पर्दर्शन (demonstration) नहीं होता है . यह तो खजाने के समान होता है… भला अपनी खजाने को कोई किसी को दिखता है .. अपनी धन को तो सब छिपा कर रखना ही पसंद करते है.

प्रेम अपने प्रेमपात्र (sweetheart) से कुछ अपेक्षा (expect), कोई आशा (hope) नहीं करता, बदले में कुछ चाहता नहीं, बल्कि वो तो प्रेमपात्र (sweetheart) पर अपना सब कुछ लुटाने को तैयार रहता है. और बस इतने से ही प्रसन्न (happy) और मस्त रहता है कि उससे प्रेम (love) है – उसे इस बात से कोई मतलब नहीं कि उसका प्रेमपात्र (sweetheart) भी उससे प्रेम करता है या नहीं.

प्रेम एक आग है . प्रसिद्द (famous) शायर जनव शेफ्ता साहब फरमाते है –
शायद इसी का नाम मोहब्बत है ‘ शेफ्ता ‘ l
इक आग सी है सिंने के अन्दर लगी हुई ll

सूफी-संत ने भी प्रेम को एक आग ही बताया है जो दिल की सब गन्दगी अर्थात वासनाओं (lust), कामनाओं (wishes) आदि को जला देती है और वह निर्मल हो जाता है –
हजरत राबिया बसरी कहते है – प्रेम की आग में मनुष्य के सारे मैल, गन्दगी, पाप जल कर भस्म हो जाते है और प्रियतम का पाना आसान हो जाता है.

हजरत अबू वर्राक कहते है – प्रेम दिल में उस अंग की तरह है जो हर गन्दगी को जला देती है और दिल निर्मल-व-पवित्र हो जाता है.

हजरत शिबली कहते है – प्रेम एक ऐसा जाम -ए – शराब ( मदिरा का प्याला ) है जो दिल में आग लगा देता है और इस आग में ईश्वर की इच्छा के सिवाय अन्य सभी इच्छाएं जल कर भस्म हो जाती है.

और ‘ ईश्वर की इच्छा ‘ में केवल एकमात्र दर्शन की इच्छा रह जाती है – जुदाई में मिलन ( अर्थात दर्शन ) की इच्छा और मिलने पर बस प्रेमपात्र को निरन्तर देखते रहने की इच्छा. परन्तु प्रेम इतना पाक-साफ ( पवित्र और निर्मल ) होता है कि किसी प्रकार का स्पर्श ( छुआ जाना ) पसंद नहीं करता. यहाँ तक कि जब दृष्टि का स्पर्श ( नजर से छुआ जाना ) भी नागवार गुजरने लगता है तो वह अपने नशीले आकर्षण की मात्रा को इतना बढ़ा देता है कि दोनों प्रेमियों की आँखे अपने-आप मिचती चली जाती है और फिर बिल्कुल बंद हो जाती है. आँखें बंद हो जाने के बाद अब वो अपने-अपने अन्तर के नेत्रों से एक-दुसरे की छवि (image) को उनके ह्रदय-पटल पर चित्रित हो गई है, देखने लगते है. यद्धपि इए अवस्था में छवि भी दिव्य होती है और दृष्टि भी दिव्य होती है , अर्थात बाहरी मौकिक सौन्दर्य और लौकिक दृष्टि दोनों बदल कर अलौकिक हो जाते है ….. पूर्णरूप से पवित्र और निर्मल …. पूरी तरह पाक-साफ हो जाते है परन्तु फिर भी प्रेम की नज़ाकत ( कोमलता ) देखिए कि अलौकिक दृष्टि से ……. दिव्य दृष्टि से छुआ जाना भी उसे सहन नहीं होता , अत: वह अपना आकर्षण और बढ़ाता है …. और बढ़ाता है यहाँ तक कि प्रेमी और प्रेमपात्र दोनों मिल कर एकमेक हो जाते है … एक-दुसरे में समा जाते है . अब कौन किसको देखे … अब किसको प्रेम-भरी दृष्टि किसके सौन्दर्य को छुए .

इस अवस्था के बाद एक और अवस्था आती है. यह अवस्था है जब प्रेमी-युगल (love couple) के प्रेम के जज्बे को देख कर प्रेम स्वयं उन पर आसक्त (addicted/attached) हो जाता है और प्रेमातिरेक (lovemaking) में विह्वल (frightened) होकर उनको अपने में समा लेता है, अर्थात इस अवस्था में प्रमी और प्रेमपात्र के अस्तित्व (existence), जो पहले की मिल कर एक हो चुके थे, प्रेम के अस्तित्व में लय हो जाते है – उनका अपना अलग कोई अस्तित्व नहीं रहता . इस अवस्था में प्रेमी-युगल स्वयं प्रेम-स्वरुप हो जाते है … प्रेम और प्रेमी-युगल दोनों एक दुसरे के पर्याय (options) हो जाते है. प्रेम का जिक्र करो तो उस प्रेमी-युगल का ध्यान आ जाता है और यदि उस प्रेमी-युगल का जिक्र करो तो प्रेम का ध्यान आ जाता है – लैला-मजनूं की बात करो तो दिल समझ जाता है कि प्रेम की बात हो रही है और प्रेम की बात करो तो अपने-आप लैला-मजनूं की याद आ जाती है. परन्तु यह अवस्था किसी-किसी बड़े भाग्यशाली प्रेमी-युगल ही को प्राप्त होती है.

संत कबीर साहब इस सम्बन्ध में कहते है –
प्रेम वह शक्ती है जो मनुष्य को प्रेम का रूप बना कर अपने में समा लेती है .
मेरे प्यारे भाई-बहन ! प्रेम को इस अवस्था तक का ही वर्णन पाया जाता है और इएके बाद यह प्रेम , प्रेमी और प्रेमपात्र को अपने साथ लेकर कौन-से लोक में पहुंचता है – मुझे नहीं मालूम . भाई , माफ़ करना .
अन्त में एक भेद की बात यह है कि यद्दपि प्रेम के अस्तित्व समाप्त हो जाता है परन्तु फिर भी उनमे कोई ; चेतन ‘ शेष रह जाता है जो इस प्रेमलीला को देखता रहता है और इसका आनन्द लेता रहता है .


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