सफलता का मूलमंत्र – The key to success

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हम सभी के life में ऐसे पल आते हैं, जिनमे हम दुविधा की स्थिति में होते हिं, निर्णय लेने में असमंजस में होते हैं और इस अनिर्णय की स्थिति के कारण हम वह अमूल्य समय व्यर्थ कर देते हैं, जिस पर कदम रखकर हम न जाने कहाँ पहुँच सकते थे, ऊँचाइयों तक जा सकते थे और कुछ विशेष कर सकते थे. दुविधा की स्थिथि में रहने वाले लोगों को इस प्रवृत्ति की आदत-सी पड़ जाती है.

वे दुविधा की स्थिति से निकलना तो चाहते हैं लेकिन निकल नहीं पाते. कई लोग ऐसे होते हैं जो दुविधा से न उभरने के कारण जीवन में आने वाली विषम परिस्थितियों से समझोता कर लेते हैं. उनके मन में विपरीत परिस्थितियों से बाहर निकलने के विचार आता है, लेकी वे कुछ नया करने का साहस नहीं जुटा पाते, नए फैसले लेने से डरते हैं.

हमारे जीवन में समझौता और सामंजस्य (adjustment) जरुरी है, लेकिन एक सीमा तक ही, इसी तरह सहनशीलता भी एक सीमा तक जरुरी है. लेकिन हर परिस्थिति (situation) में सामंजस्य व सहन करने की आदत हमें आगे बढ़ने व नए अवसर तलाशने से रोकता है, हमारी मानसिक प्रतिरोधक क्षमता को कम करती है और ऐसी परिस्थितियों में ही विकृतियों व परेशानियों को बढ़ाने का अवसर मिल जाता है.

महाभारत में पितामह भीष्म का किरदार कुछ ऐसा था, अक्सर वे दुविधा की स्थिथि में रहते थे कि क्या करें? क्या न करें ? किस तरफ वे जाएँ ? उनके निर्णय सही हैं या गलत ? वे जीवन भर खुद को परिस्थितियों के साथ समायोजित करने का प्रयास करते रहे और चाह कर भी सही निर्णय न ले सके.

जीवन में लिए गए सही फैसले और निर्णय हमारे भाग्य को निखारता है. वहीँ लिए गए गलत फैसले और निर्णयों के कारण भाग्य अंधकार के गर्त में चला जाता है, अंधकार और दुर्भाग्य से घिर जाता है. हु सभी के जीवन में फैसला केना एक क्षण का कार्य होता है, लेकिन इसका परिणाम दीर्घकालीन (long term) व जीवन की दिशा व दशा परिवर्तित करने वाला होता है.

सही फैसला लेकर न केवल जीवन की गतिधारा मोड़ी जा सकती है, बल्कि किसी भी तरह की विषमताओं से अपना पीछा छुड़ाया जा सकता है, जबकि लिया गया थोड़ा-सा भी गलत निर्णय, जीवन की सामान्य गतिविधि को असामान्य करने के लिए प्रयाप्त होता है.

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फैसले व निर्णय लेने की प्रक्रिया में समय की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जो निर्णय समय रहते ले लिए जाते हैं और अमल में लाए जाते हैं, वे अपना आश्चर्यजनक परिणाम दिखाते हैं, जबकि समय सीमा के बाहर एक second का विलंब भी भयंकर हानी पहुँचाने का कार्य कर सकता है. इसलिए फैसले लेने के लिए सही समय पर कार्य करना देहाद जरुरी है. इसका एक अच्छा उदाहरण मेंढक और उबलते पानी का है .

मेंढक के शरीर में एक खास बात ये होती है कि वह अपने शरीर के तापमान (temperature) को वातावरण (atmosphere) के अनुरूप परिवर्तित कर सकता है. इसलिए अगर किसी मेंढक को धीरे-धीरे गरम हो रहे पानी में बर्तन में छोड़ दिया जाए तो वह तापमान के हिसाब से खुद को आसानी से समायोजित कर लेता है.

जैसे-जैसे पानी का तापमान बढ़ता जाता है, मेंढक अपनी सारी उर्जा को प्रतिकूल हो रही परिस्थितियों के साथ adjust करने में लगा देता है. यह प्रक्रिया पानी के boiling point पहुँचने तक चलती है. यहाँ तक पानी का तापमान और मेंढक के शरीर का तापमान लगभग बराबर हो जाता है, लेकिन इसके आगे मेंढ़क की उर्जा खत्म हो जाती है और फिर उसकी कोशिश होती है पानी के बरतन के बहार आने की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

देखा जाये तो मेंढ़क में इतनी क्षमता होती है कि वह प्रारंभ में ही पानी से कूदकर बहार आ सकता है, लेकिन खुद को adjust करने की प्रकृति में वह अपनी पूरी क्षमता गवां देता है और यही कारण होता है कि मेंढ़क गरम होते पानी के एक छोटे से बरतन से बहार नहीं कूद पाता, क्योंकि उसने सही समय पर बाहर आने का फैसला नहीं लिया, अपनी सारी उर्जा को परिवर्तित होते वातावरण के साथ adjust करने में लगा दिया. मेंढ़क की तह हम लोग भी अक्सर इस सोच में रह जाते हैं कि काश! उस वक़्त हमने सही निर्णय लिए होते, तो आज जीवन की तसवीर कुछ और हो होती. जो व्यक्ति जैसा भी है, अपने निर्णयों व फैसलों के कारण ही है.

अक्सर निर्णय लेने में बाधा होती है, वह आती है – कठिन चुनौतोयों का सामना करने में और उनके संभावित परिणामों को स्वीकारने में. निर्णय लेना तो आसान होता है, लेकिन परिस्थितियों का सामना करना और उनके प्रतिकूल परिणामों को झेलना कठिन होता है. निर्णय लेने के बाद ऐसे निर्धारित मार्ग पर चलना होता है, जिसकी चुनौतियों व परिणामों से व्यक्ति अपरिचित होता है.

अपरिचित बाधाएं हमेसा व्यक्ति के मन में भय उत्पन्न करती है, आशंकाएं उपजती है. इसलिए मनुष्य निर्णय लेने में सरल मार्ग का चुनाव करता है, भले ही उसको थोड़ी हानि हो रही हो और कठिन मार्ग का चुनाव करने से डरता है, क्योंकि प्रतिकूल से हानी की आशंका ज्यादा होती है, लेकिन इसी मार्ग में विकास की संभावना सबसे ज्यादा होती है. जितने भी सफल व्यक्ति हुए हैं, उन्होंने जीवन में जोखिम उठाने, चुनौतियां स्वीकारने की आदत डाली है, भले ही उन्हें मार्ग में असफलता मिले, लेकिन यही असफलताएं उनकी सफलता के मार्ग की सीढ़ियाँ बनी है.

देखा जाए तो बीज अंकुरित होने की तुलना में मिट्टी में ज्यादा सुरक्षित होता है, क्योंकि अंकुरित होने में उसे अपना अस्तित्व गलाना पड़ता है, बीज के सुरक्षित आवरण को तोड़ना पड़ता है, लेकिन अंकुरित बीज के पास, सुरक्षित बीज की तुलना में अधिक बल व सामर्थ्य होता है. अंकुरित बीज का अंकुर अपने रस्ते में आने वाले हर पत्थर व मिट्टी को धीरे-धीरे हटाकर जमीन से ऊपर उठता है और इसी तरह निरंतर विक्सित होते हुए पौधे के रूप में बदल जाता है.

बीज जब गलत है, अपना अस्तित्व खोकर, अंकुरित-विकसित होकर पौधा बनता है, फलता-फूलता है तो अपने जैसे कई पौधे विकसित करने की सामर्थ्य वाले बीज प्रदान करता है. इसी तरह जब तक व्यक्ति अपने आप को सुरक्षित रखने की कोशिस करता है, वह बीज के समान होता है, जोखिम उठाने व चुनौतियाँ स्वीकारने की स्थिति में वह अंकुरित होने की स्थिति में आता है और इस मार्ग पर आगे बढ़ने में वह इतना अनुभवी, कुशल हो जाता है कि अपने समान अन्य लोगों को तैयार करने का सामर्थ्य रखता है तथा जीवन में कई महत्वपूर्ण सफलताएँ भी प्राप्त करता है.

इस तरह नए फैसले व निर्णय लेने से मन में कशमकश होती है, सवाल उठते हैं, लेकिन लिए गए सही निर्णय जीवन को नए उजालों को ओर, नई ऊँचाइयों की ओर ले जाते हैं. इसलिए उपयुक्त अवसर स्वीकारने में हिचक नहीं होनी चाहिए, कठिन परिस्थितियों के आकलन मात्र से भय नहीं होना चाहिए, बल्कि मन में हर प्रकार की परिस्थितियों का सामना करने का दृढ विश्वास होना चाहिए, यही आत्मविश्वास-दृढ़ विश्वास हमें किसी भी तरह के दुविधा से बाहर निकालने में मदद करता है और हमारे भाग्य के बंद दरवाजों को खोलता है.


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