सुरेश नाम का एक विद्यार्थी था। वह पढ़ने में बहुत कमजोर था। उसके भाई-बहन हमेशा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होते थे, पर सुरेश को कम अंक मिलने के कारण शर्मिंदा होना पड़ता था।

नौवीं कक्षा में सुरेश दोबारा अनुत्तीर्ण हुआ तो उसे बहुत दुख हुआ। निराश के कारण उसका दिल टूट गया। उसने सोचा कि अब में कौन सा मुंह लेकर घर जाऊं? इस बदनामी को झेलने की अपेक्षा मर जाना अच्छा है।

सुरेश ने आत्महत्या करने के निश्चय किया। वह अपने गांव के निकट सुनसान जंगल में गया। वहां एक पेड़ की डाल से रस्सी बांधते-बांधते एकाएक उसकी दृष्टि एक मकड़ी पर पड़ी। वह पेड़ पर चढ़ने का प्रयत्न कर रही थी, पर बार-बार नीचे फिसल जाती थी। वह कई बार पेड़ पर चढ़ी और गिरी, फिर भी उसने अपनी कोशिश जारी रखी। अंत में वह पेड़ की डाल पर पहुँच गई।

मकड़ी की यह सफलता देख कर सुरेश की निराशा गायब हो गई। मकड़ी से उसे पढ़ाई के लिए जी-तोड़ मेहनत करने की प्रेरणा मिली। उसने सोचा – जब छोटी से मकड़ी अपने प्रयत्न में सफल हो सकती है, तो मैं क्यों नहीं हो सकता? मुझे भी असफलता से निराश नहीं होना चाहिए।

सुरेश घर लौट गया। उस दिन से वह खूब ध्यान लगाकर पढ़ने लगा। इस बार परीक्षा में उसे सुनहरी सफलता मिली।

सिख – मनुष्य को असफलता से निराश नहीं होना चाहिए। मेहनत और लगन से काम करते रहने पर ही सफलता मिलती है। कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।